सावन का महीना जैसे ही दस्तक देता है, धरती हरी चूनर ओढ़ लेती है, आसमान में काले-सफेद बादल इठलाने लगते हैं और हर तरफ एक अलग ही उमंग छा जाती है। इसी उमंग और उल्लास के बीच आता है हरियाली तीज — एक ऐसा पर्व जो न केवल श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि प्रकृति, प्रेम और स्त्री-शक्ति के अनोखे मेल का उत्सव भी है। वर्ष 2026 में हरियाली तीज 15 अगस्त, शनिवार को मनाई जाएगी। आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं हरियाली तीज का महत्व, इससे जुड़ी पौराणिक कथा, पूजा-विधि और इस पर्व को मनाने की परंपराएं।

हरियाली तीज क्या है?
हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इसे श्रावणी तीज, सिंजारा तीज या छोटी तीज के नामों से भी जाना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों — राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाब में इसे “तीयां” कहा जाता है, तो राजस्थान में इसे “शिंगारा तीज” के नाम से भी पुकारा जाता है।
इस दिन का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन देवी पार्वती को कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त हुए थे। इसीलिए इस दिन को सुहागिन स्त्रियों के लिए बेहद पावन और शुभ माना गया है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और सौभाग्य की कामना के लिए इस दिन व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं।
चूंकि यह पर्व वर्षा ऋतु में आता है, जब चारों ओर हरियाली की चादर बिछी होती है, इसीलिए इसे “हरियाली तीज” कहा जाता है। यह प्रकृति के श्रृंगार और नारी के श्रृंगार, दोनों का एक साथ उत्सव है।
हरियाली तीज की पौराणिक कथा
हरियाली तीज से जुड़ी कथा शिव पुराण में वर्णित है, जो देवी पार्वती की अटूट श्रद्धा, धैर्य और प्रेम की अद्भुत मिसाल है। आइए जानते हैं यह प्रचलित कथा—
प्राचीन काल की बात है। हिमालय राज की पुत्री पार्वती ने बचपन से ही अपने मन में यह ठान लिया था कि वे भगवान शिव को ही अपना पति बनाएंगी। बचपन से ही वे भोलेनाथ की अनन्य भक्त थीं और उन्हीं की आराधना में लीन रहती थीं। परंतु राजा हिमालय अपनी पुत्री के इस निर्णय से सहमत नहीं थे। वे चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह किसी समृद्ध और वैभवशाली राजकुमार से हो।
एक दिन देवर्षि नारद हिमालय राज के दरबार में पधारे। उन्होंने राजा को सुझाव दिया कि पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से करा दिया जाए, क्योंकि विष्णु जी से बेहतर वर पूरे त्रिलोक में कोई नहीं हो सकता। राजा हिमालय यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। लेकिन जब यह बात देवी पार्वती को पता चली, तो वे बहुत दुखी हुईं। उनका मन तो पहले से ही शिवजी को समर्पित था, वे किसी और से विवाह करने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं।
पार्वती जी अपनी सखियों के पास गईं और अपना दुख उनसे साझा किया। उन्होंने कहा कि वे किसी भी हालत में भगवान शिव के अतिरिक्त किसी और को अपना पति स्वीकार नहीं करेंगी। उनकी सखियों ने उनका साथ दिया और उन्हें एक घने जंगल में ले गईं, ताकि पिता द्वारा तय किया गया विवाह टाला जा सके। वहां घने जंगल में, एक गुफा में देवी पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए घोर तपस्या आरंभ की।
यह तपस्या साधारण नहीं थी। कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 108 जन्मों तक कठोर तप किया। उन्होंने न अन्न ग्रहण किया, न जल, केवल पत्तों पर जीवन यापन करती रहीं और अंततः निराहार रहकर भी अपनी तपस्या में लीन रहीं। कड़ी धूप हो या घनघोर बारिश, कड़ाके की सर्दी हो या भीषण गर्मी — पार्वती जी का संकल्प कभी नहीं डगमगाया। उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा-अर्चना की और अपने आराध्य को पाने के लिए दिन-रात प्रार्थना करती रहीं।
पार्वती जी की इस अद्वितीय भक्ति, त्याग और संकल्प को देखकर अंततः भगवान शिव का हृदय पिघल गया। वे प्रसन्न होकर देवी पार्वती के समक्ष प्रकट हुए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने की सहमति दी। यह शुभ दिन श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया थी। इसी दिन को आगे चलकर “हरियाली तीज” के नाम से जाना जाने लगा।
जब यह समाचार राजा हिमालय तक पहुंचा, तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने अपनी पुत्री की इच्छा का सम्मान करते हुए विधि-विधान से देवी पार्वती और भगवान शिव का विवाह संपन्न कराया। इसी कारण हरियाली तीज को माता पार्वती और भगवान शिव के मिलन और विवाह की स्मृति में मनाया जाता है।
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची श्रद्धा, अटूट संकल्प और धैर्य से कोई भी इच्छा असंभव नहीं होती। पार्वती जी का यह त्याग और तप आज भी हर उस स्त्री के लिए प्रेरणा है जो अपने रिश्तों में विश्वास और समर्पण के साथ खड़ी रहती है। इसी वजह से माता पार्वती को इस दिन “तीज माता” के रूप में भी पूजा जाता है, और यह मान्यता है कि जो भी सुहागिन स्त्री सच्चे मन से इस दिन व्रत रखती है, उसे अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
हरियाली तीज की पूजा विधि
हरियाली तीज का व्रत और पूजा विधि-विधान से की जाती है। आमतौर पर इसे इस प्रकार संपन्न किया जाता है—
1. स्नान और शुद्धिकरण: व्रत के दिन महिलाएं प्रातः स्नान करके स्वच्छ अथवा नए वस्त्र धारण करती हैं। अधिकांश स्त्रियां इस दिन हरे रंग की साड़ी या सूट पहनना शुभ मानती हैं, क्योंकि हरा रंग सावन की हरियाली और सुहाग का प्रतीक है।
2. पूजा स्थल की सजावट: घर के आंगन या पूजा स्थान को तोरण और फूलों से सजाया जाता है। एक चौकी पर मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, माता पार्वती, भगवान गणेश और उनकी सखियों की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं।
3. षोडशोपचार पूजन: भगवान शिव और माता पार्वती का विधिवत पूजन किया जाता है, जिसमें रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। माता पार्वती को श्रृंगार का सामान — चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी आदि अर्पित करना विशेष शुभ माना जाता है।
4. व्रत कथा श्रवण: पूजा के दौरान हरियाली तीज की कथा सुनी या सुनाई जाती है, जिससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
5. सुहाग की भेंट: विवाहित महिलाएं अपनी सास के पैर छूकर उन्हें “सुहागी” (श्रृंगार का सामान) भेंट करती हैं। यदि सास उपलब्ध न हों तो यह परंपरा जेठानी या घर की किसी वरिष्ठ महिला के साथ निभाई जाती है।
6. निर्जला या फलाहार व्रत: कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ फलाहार करके व्रत पूरा करती हैं। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत श्रद्धा और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।
सिंजारा या सिंधारा : तीज से एक दिन पहले की परंपरा
हरियाली तीज से एक दिन पूर्व “सिंजारा” या “सिंधारा” मनाया जाता है, जिसका विशेष महत्व है, खासकर राजस्थान, हरियाणा और उत्तर भारत के कई हिस्सों में। इस दिन नवविवाहित बेटी के मायके से ससुराल भेजे गए वस्त्र, आभूषण, मेहंदी, चूड़ियां और मिठाइयां भेजी जाती हैं। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि माता-पिता के प्रेम और शुभकामनाओं का प्रतीक है। नवविवाहित युवतियों को इस अवसर पर विशेष रूप से पीहर बुलाया जाता है, जिससे यह त्योहार पारिवारिक जुड़ाव और अपनेपन की मिठास से भर जाता है।
मेहंदी, झूला और लोकगीत — तीज के रंग
हरियाली तीज पर मेहंदी लगाने की परंपरा बेहद खास है। महिलाएं और युवतियां अपने हाथों में सुंदर मेहंदी डिज़ाइन बनवाती हैं, जो सुहाग की निशानी मानी जाती है। कई जगहों पर पैरों में आलता भी लगाया जाता है।
इस त्योहार की सबसे खूबसूरत झलक पेड़ों पर पड़े झूलों में दिखाई देती है। सावन की रिमझिम फुहारों के बीच नीम, बरगद और आम के पेड़ों पर रंग-बिरंगे झूले डाले जाते हैं। महिलाएं और युवतियां समूह में इकट्ठा होकर झूला झूलती हैं और साथ ही पारंपरिक तीज के लोकगीत गाती हैं। ये गीत प्रेम, मायके की यादों, पति-पत्नी के रिश्ते और प्रकृति की सुंदरता को समर्पित होते हैं। कहीं-कहीं इस मौके पर छोटे-छोटे मेले भी लगते हैं, जहां माता पार्वती की सवारी बड़े हर्षोल्लास के साथ निकाली जाती है।
हरियाली तीज का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
हरियाली तीज केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह स्त्रियों के आपसी मेल-मिलाप, सामूहिकता और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का एक सशक्त माध्यम भी है। इस दिन घर की सभी महिलाएं — दादी, मां, बहन, बेटी और सहेलियां — एक साथ इकट्ठा होकर उत्सव मनाती हैं। यह पर्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपराओं को आगे बढ़ाने का भी अवसर बनता है, जहां बड़ी-बूढ़ी महिलाएं छोटी लड़कियों को व्रत की कथा, गीत और रीति-रिवाज सिखाती हैं।
इसके अलावा, यह त्योहार प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर है। सावन की बारिश के बाद जब धरती हरी-भरी हो जाती है, तब यह पर्व मानो प्रकृति के इस श्रृंगार का उत्सव मनाने के लिए ही रचा गया हो। हरे रंग के वस्त्र, हरी चूड़ियां और चारों ओर फैली हरियाली — यह सब मिलकर इस त्योहार को एक अनूठा दृश्य प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष
हरियाली तीज केवल एक व्रत या पूजा-पाठ का पर्व नहीं है, यह श्रद्धा, प्रेम, धैर्य और स्त्री-शक्ति की एक अनूठी गाथा है। माता पार्वती की तपस्या हमें सिखाती है कि यदि मन में सच्चा संकल्प हो, तो हर बाधा को पार किया जा सकता है। यह पर्व हमें अपनों से जुड़े रहने, परंपराओं को संजोए रखने और प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने की प्रेरणा भी देता है।
जैसे-जैसे सावन के बादल घिरते हैं और धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, हरियाली तीज का यह पर्व हर घर में उमंग, उल्लास और भक्ति का संचार करता है। तो इस 15 अगस्त 2026 को, जब हरियाली तीज का यह पावन पर्व आए, तो अपने परिवार के साथ मिलकर इस उत्सव का आनंद लीजिए, झूला झूलिए, मेहंदी लगाइए और माता पार्वती व भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त कीजिए।
हरियाली तीज की हार्दिक शुभकामनाएं!
