चंद्र ग्रहण क्यों लगता है? पौराणिक कथा और वैज्ञानिक कारण

भारतीय संस्कृति में आकाशीय घटनाओं का विशेष महत्व रहा है। सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को केवल खगोलीय घटना नहीं माना गया, बल्कि इन्हें धर्म, ज्योतिष और आध्यात्म से भी जोड़ा गया है। विशेष रूप से चंद्र ग्रहण को लेकर लोगों के मन में कई प्रश्न होते हैं—
चंद्र ग्रहण क्यों लगता है?
क्या यह अशुभ होता है?
पौराणिक कथाओं में इसका क्या वर्णन है?
और
विज्ञान इसे कैसे समझाता है?

चंद्र ग्रहण क्या होता है?

चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। यह घटना केवल पूर्णिमा के दिन ही संभव होती है, क्योंकि उसी समय चंद्रमा पृथ्वी के ठीक सामने होता है।

जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा को पूरी तरह ढक लेती है, तब उसे पूर्ण चंद्र ग्रहण कहा जाता है।
यदि चंद्रमा का केवल कुछ हिस्सा छाया में आए, तो वह आंशिक चंद्र ग्रहण कहलाता है।

चंद्र ग्रहण के दौरान राहु द्वारा चंद्रमा को निगलते हुए दर्शाती भारतीय पौराणिक कथा और पृथ्वी की छाया का दृश्य

भारतीय पौराणिक कथा: राहु–केतु और चंद्र ग्रहण

भारतीय पौराणिक कथाओं में चंद्र ग्रहण की एक अत्यंत रोचक और प्रसिद्ध कहानी मिलती है, जो समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है।

समुद्र मंथन की कथा के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन का प्रमुख कारण महर्षि दुर्वासा का श्राप था जो उन्होंने देवराज इंद्र को दिया था। समुद्र मंथन से 14 रतन निकले उनमें से जब अमृत निकला, तो देवताओं और असुरों के बीच इसे लेकर विवाद हो गया।
असुर उस अमृत को ग्रहण कर तीनो लोको में हाहाकार ना मचा दे इसके लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाने का निर्णय लिया।

इसी दौरान एक असुर, जिसका नाम स्वर्भानु था, छल से देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और अमृत पीने लगा।
सूर्य देव और चंद्र देव ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु को इसकी सूचना दी।
इस पर भगवान विष्णु को क्रोध आ गया और उन्होंने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर धड़ से अलग कर दिया।
लेकिन चूँकि वह अमृत पी चुका था, इसलिए उसका सिर और धड़ अमर हो गए।सिर को कहा गया राहु और धड़ को कहा गया केतु।

इसलिए राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा से बदला लेने के लिए समय-समय पर उन्हें निगलने का प्रयास करते हैं।
जब राहु चंद्रमा को निगलता है, तो चंद्र ग्रहण लगता है।

लेकिन चंद्रमा अमर है, इसलिए राहु उसे पूरी तरह निगल नहीं पाता और कुछ समय बाद चंद्रमा पुनः दिखाई देने लगता है—यही ग्रहण की समाप्ति मानी जाती है।

धार्मिक मान्यताएँ और चंद्र ग्रहण

भारतीय धर्मग्रंथों में चंद्र ग्रहण के समय कुछ विशेष नियम बताए गए हैं:
• ग्रहण के दौरान भोजन नहीं करना चाहिए
• मंदिरों के कपाट बंद रखे जाते हैं
• गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी रखने की सलाह दी जाती है
• ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान और दान का महत्व बताया गया है

चंद्र ग्रहण का वैज्ञानिक कारण

पृथ्वी की छाया का खेल

विज्ञान के अनुसार, चंद्र ग्रहण पूरी तरह से एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है।

जब:
• सूर्य एक ओर होता है
• पृथ्वी बीच में आ जाती है
• और चंद्रमा पृथ्वी की कक्षा में सूर्य के सामने होता है

तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है।

पृथ्वी की छाया दो भागों में होती है:
1. उपच्छाया (Penumbra) – हल्की छाया
2. पूर्ण छाया (Umbra) – गहरी छाया

जब चंद्रमा पूरी तरह पूर्ण छाया में चला जाता है, तब पूर्ण चंद्र ग्रहण होता है।

चंद्रमा लाल क्यों दिखता है? (ब्लड मून)

पूर्ण चंद्र ग्रहण के समय चंद्रमा अक्सर लाल या तांबे के रंग का दिखाई देता है। इसे ब्लड मून भी कहा जाता है।

इसका कारण है:
• सूर्य का प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरता है
• नीली रोशनी बिखर जाती है
• लाल रोशनी मुड़कर चंद्रमा तक पहुँच जाती है

यही कारण है कि ग्रहण के दौरान चंद्रमा लाल दिखाई देता है।

क्या चंद्र ग्रहण हानिकारक है?

विज्ञान के अनुसार:
• चंद्र ग्रहण मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है
• इसे नंगी आँखों से देखना पूरी तरह सुरक्षित है
• इसका गर्भावस्था पर कोई वैज्ञानिक नकारात्मक प्रभाव सिद्ध नहीं हुआ है

हालाँकि, धार्मिक मान्यताएँ आज भी समाज में गहराई से जुड़ी हुई हैं और लोग श्रद्धा के कारण नियमों का पालन करते हैं।

चंद्र ग्रहण और ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण को महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि चंद्रमा मन, भावना और मानसिक स्थिति का कारक ग्रह है।

ज्योतिष के अनुसार:
• चंद्र ग्रहण मानसिक अस्थिरता ला सकता है
• ध्यान, मंत्र जाप और साधना के लिए यह समय प्रभावशाली माना जाता है
• ग्रहण काल में किए गए जप का फल कई गुना अधिक माना गया है

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