भगवान विष्णु के आठवें अवतार – बलराम जी

बलराम जी -हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनहार के रूप में जाना जाता है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा है, तब-तब उन्होंने विभिन्न अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते है। भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों को दशावतार कहा जाता है। इनमें आठवाँ अवतार बलराम माने जाते हैं। बलराम जी को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई के रूप में भी जाना जाता है।

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बलराम जी का जन्म

बलराम जी का जन्म द्वापर युग में हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया और कंस जैसे दुष्ट राजा ने धरती पर आतंक मचा रखा था, तब भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण और बलराम जी के रूप में अवतार लिया।

बलराम जी का गर्भ मूल रूप से माता देवकी के गर्भ से स्थापित हुआ था, लेकिन कंस के भय के कारण योगमाया ने उस गर्भ को वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया।

जब उनका जन्म हुआ तो उनका नाम ‘बलराम’ रखा गया। “बल” का अर्थ है शक्ति और “राम” का अर्थ है आनंद देने वाला। अर्थात् बलराम का अर्थ हुआ – “शक्ति से युक्त और आनंद देने वाला।”

उनका बचपन गोकुल और वृंदावन में बीता। वे अत्यंत बलवान और पराक्रमी थे। वे श्रीकृष्ण के साथ गाय चराने जाते और बालकों की रक्षा करते। बचपन से ही उन्होंने अपने असाधारण बल और शौर्य का प्रदर्शन किया।

शास्त्रों में बलराम जी का वर्णन गौरवर्ण (श्वेत रंग) वाले पुरुष के रूप में मिलता है। वे हल और मूसल धारण करते हैं। हल खेती का प्रतीक है और मूसल शक्ति का। यही कारण है कि उन्हें हलधर भी कहा जाता है।

बलराम जी का जीवन पराक्रम और शौर्य से भरा हुआ है। उन्होंने अनेक राक्षसों का वध किया।उन्होंने बाल्यकाल में ही कई असुरों को पराजित किया।उन्होंने दैत्य प्रलंबासुर का वध किया।बलराम जी ने अपने बल से यमुनाजी का मार्ग बदल दिया, जब वह अहंकार में बह रही थीं। उनके प्रभाव से मथुरा और द्वारका सुरक्षित हुए। बलराम की गदा और बल अनुपम थे। वे एक महान योद्धा और गदा के अद्वितीय विशेषज्ञ माने जाते हैं।

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बलराम जी और श्रीकृष्ण

बलराम जी हमेशा श्रीकृष्ण के साथ रहे। वे उनके बड़े भाई और सहयोगी थे। जब कृष्ण ने कंस का वध किया और मथुरा को कंस के आतंक से मुक्त किया, तब बलराम ने भी उनका पूरा साथ दिया।

महाभारत में भी बलराम का विशेष स्थान है। हालांकि वे कुरुक्षेत्र युद्ध में शामिल नहीं हुए क्योंकि दोनों पक्षों – पांडव और कौरव – से उनका संबंध था। परंतु उन्होंने अपने शिष्यों को धर्म का पालन करने की शिक्षा दी।

बलराम जी गदा युद्ध के महान उस्ताद थे। उन्होंने भीम और दुर्योधन दोनों को गदा का प्रशिक्षण दिया। यही कारण है कि महाभारत में गदा युद्ध का इतना महत्व दिखाई देता है।

उनका यह कौशल दर्शाता है कि बलराम केवल शक्ति के नहीं, बल्कि युद्धकला और संतुलन के भी प्रतीक थे।

बलराम जी और कृषि

बलराम जी को कृषि का देवता भी माना जाता है। उनके हाथ में हल इस बात का प्रतीक है कि वे किसानों और खेती-किसानी के रक्षक हैं। भारत की कृषि परंपरा में बलराम का विशेष महत्व है। आज भी कई क्षेत्रों में किसान उन्हें अपनी श्रद्धा से याद करते हैं।

बलराम जी का विवाह

बलराम जी का विवाह रेवती जी से हुआ था। रेवती राजा रैवत की पुत्री थीं। पौराणिक कथा के अनुसार, रेवती अत्यधिक लंबी थीं और उनके योग्य कोई वर नहीं मिल रहा था। तब बलराम जी ने अपने हल से रेवती के शरीर को सामान्य मानव काया के अनुरूप बना दिया और उनसे विवाह किया।

बलराम जी का महत्व

बलराम जी केवल शक्ति और पराक्रम के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे कृषि, साधुता और धर्म के भी प्रतीक हैं। वे हमें यह संदेश देते हैं कि शक्ति का प्रयोग सदैव धर्म और न्याय के लिए होना चाहिए।

उनका जीवन सिखाता है कि हमें अपनी शक्ति का उपयोग समाज की रक्षा और कल्याण में करना चाहिए, न कि अहंकार और अत्याचार में।

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