हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में जाना जाता है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों मे नौवां अवतार है — भगवान गौतम बुद्ध, जिन्होंने मानवता को अहिंसा, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरित किया ।
भगवान बुद्ध का जन्म
भगवान बुद्ध का जन्म लुंबिनी (आज के नेपाल में) में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा शुद्धोधन और माता का नाम रानी माया देवी था। बचपन में उनका नाम सिद्धार्थ गौतम रखा गया। वे शाक्य वंश के राजकुमार थे, इसलिए उन्हें “शाक्यमुनि” भी कहा जाता है। बचपन से ही वे संवेदनशील और दयालु स्वभाव के थे। उनका दयालु स्वभाव इससे भी जाना जा सकता है एक बार उनके चचरे भाई ने एक हंस को तीर से घायल कर दिया पर सिद्धार्थ ने उसकी जान बचाई।
उनके जन्म के साथ कई भविष्यकर्ताओ ने उनको लेके ये भविष्यवानी की राजकुमार या तो एक महान राजा बनेंगे या एक महान संत बनेंगे । राजा शुद्धोधन ने सोचा के कंही वो एक मुनि ना बन जाये इसलिए राजकुमार सिद्धार्थ को जीवन के सुख-सुविधाओं में रखा गया ताकि उन्हें संसार के दुखों का अनुभव न हो। परंतु एक दिन जब वे नगर भ्रमण पर निकले, तब उन्होंने चार दृश्य देखे — एक बूढ़ा व्यक्ति जो देखने मे बिलकुल असहाय था, कोई काम करने मे सक्षम नहीं था, एक रोगी जिसका चेहरा पीला पड़ चूका था और मरने की हालत मे था, एक मृत शरीर को देखा जिसे चार लोग अर्थी पर ले जा रहे थे,कुछ लोग रो रहे थे और कुछ लोग उस अर्थी के पीछे चल रहे थे और फिर एक साधु को देखा जो सभी मोह माया से दूर था। इन चार दृश्यों ने उनके मन को गहराई से झकझोर दिया और उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ।
16 वर्ष की आयु मे उनका विवाह यशोधरा नाम की लड़की से हुआ और उनका एक पुत्र भी था जिसका नाम राहुल था । किन्तु उनका मन इस नश्वर संसार से विमूख हो गया था और उन्होंने 29 वर्ष की आयु में उन्होंने राजमहल, परिवार और वैभव को त्यागकर सत्य की खोज में वन को चले गए । वर्षों तक उन्होंने तपस्या और ध्यान किया, परंतु उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। अंततः उन्होंने बोधगया (बिहार) में पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया और वे “गौतम बुद्ध” कहलाए।जिस वृक्ष के नीचे उन्होंने ध्यान लगाया था उसे “बोधि वृक्ष“ के नाम से जाना जाता है।
चार सत्य
1. दुःख – जीवन में दुःख है।
2. दुःख का कारण – यह दुःख इच्छा और आसक्ति के कारण है।
3. दुःख का निवारण – इच्छा और आसक्ति का अंत करने से दुःख समाप्त हो सकता है।
4. दुःख निवारण का मार्ग – यह अष्टांगिक मार्ग है।
धार्मिक दृष्टिकोण से भगवान बुद्ध का अवतार दो अर्थों में देखा जाता है –
1. धार्मिक सुधारक के रूप में, जिन्होंने पशुबलि, कर्मकांड और अंधविश्वासों का विरोध किया।
2. विष्णु के अवतार के रूप में, जिन्होंने लोगों को अहिंसा, प्रेम और करुणा का संदेश दिया, ताकि संसार धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझ सके।
भगवान बुद्ध और हिन्दू धर्म का संबंध
कई विद्वानों का मानना है कि भगवान बुद्ध ने हिन्दू धर्म की आत्मा को पुनः जीवित किया। उन्होंने धर्म को बाहरी कर्मकांड से हटाकर आत्मिक शुद्धि और सत्य के अनुभव पर केंद्रित किया। उनके उपदेशों में कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष की अवधारणा भी शामिल थी, जो हिन्दू दर्शन से गहराई से जुड़ी है।
हिन्दू मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने बुद्ध के रूप में अवतार लेकर अधर्म का नाश नहीं, बल्कि अधर्म को स्वयं अधर्मियों में फैलाकर उन्हें उनके कर्मों का फल दिलवाया। इस प्रकार, भगवान बुद्ध का अवतार ईश्वरीय योजना का ही हिस्सा था।
भगवान बुद्ध ने कहा —
“अप्प दीपो भव।”
अर्थात, “स्वयं अपना दीपक बनो।”
उन्होंने सिखाया कि सच्चा धर्म बाहरी पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि करुणा, संयम और सत्य में है। उन्होंने वर्ग, जाति या भाषा के भेद को अस्वीकार किया और सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टि रखने का संदेश दिया।
भगवान विष्णु का नौवां अवतार गौतम बुद्ध मानवता के लिए करुणा, प्रेम और ज्ञान का प्रतीक हैं। उन्होंने सिखाया कि सच्चा धर्म हिंसा, ईर्ष्या या अहंकार में नहीं, बल्कि दया, सत्य और शांति में निहित है।
भगवान बुद्ध का जीवन हमें यह सिखाता है कि हर व्यक्ति अपने भीतर ईश्वर को खोज सकता है, बशर्ते वह सही मार्ग चुने। यही कारण है कि आज भी करोड़ों लोग बुद्ध के उपदेशों से प्रेरणा लेकर जीवन में शांति और समता का अनुभव करते हैं।

